
- सीतापुर की शान, सौ साल का इतिहास… आई हॉस्पिटल की कहानी, शहर की जुबानी
● सुहेल वहीद
सन 1975 में जब हम पहली बार नैनीताल गए तो झील किनारे बाईं तरफ “सीतापुर आई हास्पिटल” देख कर मज़ा आ गया था। अपने सीतापुर का नाम देख कर सीना चौड़ा हो गया था। आज उसी “सीतापुर आई हॉस्पिटल” को सौ बरस पूरे हुए हैं, इस अवसर पर एक कॉफी टेबल बुक भी लखनऊ में लांच की जा रही है। एक दौर था कि सीतापुर में सर्दियां शुरू होते ही मेहमाननवाज़ी शुरू हो जाती थी, न जाने कहाँ कहाँ से लोग आ जाते थे आँखों के इलाज के लिए और सुबह हॉस्पिटल के हर पेड़ हर कोने अंतरे में रज़ाईयां ओढ़े लोग सोते हुए मिलते थे। तब न होटल होते थे और न उतने टेंट हाउस। पता नहीं कैसे इतने इंतज़ाम किए जाते थे। सर्दियों में शायद ही कोई घर बचता था कि कोई मेहमान बीमार आँखों को लिए न आ जाता हो।

पूरे शहर में आँखों के इन बीमारों से रौनक़ रहती थी। आई हास्पिटल रोड, वो चाहें लालबाग़ से जा रही हो या बड़े डाकख़ाने की तरफ से, या फिर सिविल लाइंस की ओर से उस पर रिक्शे और पैदल लोगों को आते जाते देखना रोज़ाना का मशग़ला था। बाद में जब आरएमपी कॉलेज में दाख़िला ले लिया तो फिर तो रास्ता ही वही था। कभी हास्पिटल के अंदर से गोल घुमावदार साफ़ सुथरी सड़कों पर साइकिल दौड़ाना तो कभी पूरे हास्पिटल के रास्तों को पैदल नापना। जब मन किया ऑपटोमेट्री में जाकर आँखों की जांच के लिए लाइन में बैठ जाते, नंबर आता अच्छी सी डॉक्टर एक मशीन पर ठुड्डी फिट करके बज़रिये लेंस आंखों की जांच कर देती। सात आठ इंच की दूरी या नज़दीकी ! उस ज़माने इससे अच्छा और कुछ था भी नहीं और अपन कई दिन तक खुश रहते। हॉस्पिटल के बीचो बीच गोल पार्क की बेंचों पर कई शामें गुज़ारीं। तब सीतापुर में पड़ोस के कम्पनी गार्डन में भी ऐसी उम्दा सीमेंटेड बेंचें नहीं थीं।

खैराबाद में एक खपरैल की छत वाले झोपड़ी नुमा मकान से शुरू हुआ था 1926 में सीतापुर आई हास्पिटल का सफर, 1943 में इस बिल्डिंग का शिलान्यास किया गया था जो अब है और सिर्फ दस हज़ार रुपए से ट्रस्ट बनाया गया था जो अब यह शानदार हास्पिटल चला रहा है जिसमें 192 जनरल वार्ड हैं और 37 प्राइवेट वार्ड।
सीतापुर डॉक्टर एमपी मेहरे का हमेशा क़र्ज़दार रहेगा जिन्होंने इलाहाबाद से आकर यहां अस्पताल खोला। राधाकृष्णन, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई से लेकर कौन नहीं था उस जमाने में जो यहां न आया हो। लेकिन पिछले बीस पच्चीस साल में इसने अपनी आभा थोड़ी सी खोई। बीजेपी नेता स्वर्गीय राजेंद्र गुप्ता जी, जिनके साथ कई बार हमने सीतापुर से लखनऊ तक रोडवेज़ बस में सफर किया, वित्त मंत्री थे तब भी। प्लाईवुड फैक्ट्री और आई हास्पिटल, यही दोनों सीतापुर की पहचान थीं, प्लाईवुड फैक्ट्री तो समाप्त ही हो गई, दोनों में गुप्ता जी की भूमिका को लोग अभी तक भूले नहीं हैं। वो सब पुरानी बातें हैं, लेकिन आई हास्पिटल आज अपनी सफलता के सौ बरस पूरे कर रहा है और हम एवंईं खुश हैं !



