
आज है शबे बरात, 13 फरवरी की रात जाग कर इबादत करेंगे मुसलमान।
परिचय:
शबे बरात, यानी शाबान की 15वीं रात, अक्सर मुआफ़ी, रहमत और तकदीर के फैसले की रात के रूप में मनाई जाती है। हालाँकि, कुरआन और सही हदीस में इस रात की फज़ीलत के संदर्भ में स्पष्ट प्रमाण केवल लैलतुल क़द्र से मिलते हैं, जो रमज़ान की पवित्र रात है। अतः शबे बरात को लेकर कई गैर-सिद्ध रिवायतें खुराफात और बिदात की श्रेणी में आती हैं।
इबादत कैसे करें:
खुलूस और सच्चाई-
शबे बरात में इबादत का मूल मकसद दिल से अल्लाह से तौबा, दुआ और क़ुरआन की तिलावत करना है। जरूरी यह नहीं कि पूरा रात जाग कर ही इबादत की जाए। यदि आप रात के कुछ हिस्सों में, खुलूस के साथ, सच्चे मन से नमाज़, क़ुरआन, और दुआ करते हैं, तो अल्लाह ताला उन दुआओं को जरूर कुबूल फरमाएंगे।
नियमित इबादत:
रोज़मर्रा की इबादत, चाहे वह नमाज़ हो या क़ुरआन की तिलावत, आपके अंदर की आस्था को मजबूत करती है। शबे बरात की रात भी उसी भावना का इज़हार है – अल्लाह से करीब रहने का, अपनी कमियों को सुधारने का और मुआफ़ी की दुआ करने का।
खुराफात और बिदात से बचें:
असली हदीस पर अमल-
कई रिवायतें और रस्में, जैसे कब्रिस्तान जाकर अनावश्यक रिवाज़ करना, हलवा बनाना, या विशेष रस्मों में उलझ जाना, हदीस के ठोस प्रमाण से परे हैं। प्रसिद्ध हदीस विद्वानों ने इन रिवायतों को कमजोर बताया है। अतः इन नवाचारों (बिदात) और अंधविश्वास (खुराफात) से दूर रहना ही सही रास्ता है।
साधारण और सरल इबादत:
अगर आप इबादत में लीन होकर थोड़े समय के लिए जागते हैं और अपने दिल की सच्चाई के साथ नमाज़, क़ुरआन और दुआ में लग जाते हैं, तो यह आपके लिए काफी है। अल्लाह ताला निश्चय ही सच्चे दिल से की गई इबादत को अपना प्यार और रहमत बरसाता है।
निष्कर्ष:
शबे बरात की असली फज़ीलत उस रात भर जागने में नहीं, बल्कि खुलूस, तौबा और अल्लाह के करीब आने में है। यदि आप सच्चे दिल से थोड़े समय के लिए इबादत करते हैं, तो आपकी दुआएं और तौबा अल्लाह के सामने कबूल हो जाएंगी – इन शा अल्लाह। हमें हर दिन, हर रात ईमानदारी से अल्लाह की इबादत करनी चाहिए और अनावश्यक रिवाज़ों से बचना चाहिए।
आइए, हम अपने इरादों को सच्चाई और खुलूस से सजाएँ और अल्लाह की रहमत का इंतज़ाम पाएँ।
आमीन!
मौलाना आसिम क़ासमी (लखनऊ)