जियाउर्रहमान अंसारी ने डाली संसद में शेरो शायरी की परंपरा

● सुहेल वहीद

पार्लियामेंट में और जब तब विधानसभाओं में किसी न किसी बहस के दौरान उर्दू के शेर नेता लोग सुना देते हैं, बजट भाषण तो शायद ही कभी बिना अशआर के मुकम्मल हुआ हो। पार्लियामेंट में इस शेरो शायरी को भाषण में इस्तेमाल करने की शुरुआत केंद्रीय मंत्री रहे ज़ियाउर्रहमान अंसारी ने की थी। उन्होंने ही अपनी तकरीर में उस्ताद शायरों के शेर सुनाने शुरु किए और धीरे धीरे यह हिंदुस्तान की संसदीय सियासत की अहम परंपरा बन गई। जियाउर्रहमान अंसारी ने 26 जुलाई 1971 को पार्लियामेंट में चौबीस वें कांस्टीटयूशनल बिल पर बहस करते हुए अपनी शानदार तकरीर के दौरान जब यह शेर पढ़ा तो पहली मर्तबा उनकी ज़हानत की दाद लोगों ने दी और उस दिन से वह कौमी सतह पर मुस्लिम लीडरों में शुमार होने लगे।

वह चश्मे फितनागर है साकी ए पैमाना बरसों से
के पैहम  लड़  रहे  हैं शीशओ पैमाना बरसों से

जियाउर्रहमान अंसारी को सियासी बातों में अशआर पेवस्त करने के लिए ही नहीं, शाह बानो के मशहूर तलाक केस में हुई सियासत और ‘मुस्लिम महिला (तलाक़ पर अधिकार का संरक्षण ) एक्ट1986’ को लागू करने में बेहद अहम किरदार अदा करने के लिए भी जाना जाता है।
शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में वह फैसला सुनाया जिसमें तलाक शुदा शाह बानो को मेंटेनेंस देने की उनके पूर्व पति को निर्देश दिए गए थे। इस फैसले से हिंदुस्तान के मुस्लिम समाज में बहस शुरु हो गई और जगह जगह प्रदर्शन भी कि यह फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ में दख़ल है और उसके बाद राजीव गांधी की सरकार में इस विषय पर करीब एक साल तक विचार विमर्श के बाद और ’मुस्लिम महिला (तलाक़ पर अधिकार का संरक्षण ) एक्ट 1986 को पार्लियामेंट में मंजूरी मिल गई। अक्सर कहा जाता है कि इस कानून के लागू होने बाद से ही मुल्क की सियासत ने एक नया मोड़ ले लिया। शाह बानो विवाद पर हुई पार्लियामेंट में बहस में उस वक्त के दो केंद्रीय मंत्री जियाउर्रहमान अंसारी और आरिफ मोहम्मद खां का नाम हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बन गया। आरिफ मोहम्मद खां ने इस कानून के खिलाफ कुरान के हवालों से तकरीर की थी और इसी कानून के खिलाफ केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था जबकि जियाउर्रहमान अंसारी ने इस कानून की हिमायत में इस्लामी दलीलें पेश की थीं।

जियाउर्रहमान अंसारी तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीमती मोहसिना किदवई के साथ 1983 में मद्रास में एक शैक्षिक कार्यक्रम में

जियाउर्रहमान अंसारी यूपी के उन्नाव से 1971, 1977 और 1980 में सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में लगातार मंत्री रहे। जियाउर्रहमान अंसारी एक बाइज़्ज़त खानदान से ताल्लुक रखते थे और उनके दादा हाफिज़ अब्दुस्समद गाजीपुर के थे और वह वहां से आकर उन्नाव जिले के बांगरमऊ में आकर बस गए थे। उनके वालिद हबीबुर्रहमान थे जो वहां वकालत भी करते थे और उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी सरगर्मी से हिस्सा लिया था। उन्हें 1940 में गिरफ्तार कर लिया गया था। वह करीब आठ माह तक जेल में रहे। उसकेबाद ’हिंदुस्तान छोड़ो तहरीक’ में शामिल होकर नौ अगस्त 1942 को फिर गिरफ्तार हो गए और दिसम्बर 1943 को आगरा जेल से रिहा हुए। उन्होंने 1946 में पहली मर्तबा कांग्रेस उम्मीदवार की हैसियत से लखनऊ- उन्नाव सीट से यूपी असेंबली का इलेक्शन लड़ा और जीत गए। इसके बाद 1951 में सफीपुर से भी वह जीते और 25 फरवरी 1957 उनकी सियासी ज़िन्दगी का आखिरी दिन साबित हुआ जिस दिन वह चुनाव हार गए। इस चुनाव में उनकी हार की वजह अनवार अहमद साबित हुए जिनको कभी हबीबुर्रहमान ने अपने एक दोस्त के सिफारिशी खत पर 1940 में अपना जूनियर रख लिया था।
हबीबुर्रहमान की कांग्रेस में बड़ी इज्जत थी, 1987 में जब जियाउर्रहमान अंसारी न्यूयार्क गए तो वहां एक अस्पताल में पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेडडी भर्ती थे, उन्होंने अपने डॉक्टर बेटे से जियाउर्रहमान का परिचय भारत के केंद्रीय मंत्री के रूप में नहीं बल्कि ’यह एक बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के बेटे हैं’ कह कर कराया।
इसे मात्र संयोग कहा जा सकता है कि जियाउर्रहमान अंसारी के वालिद हबीबुर्रहमान को उनके जूनियर की वजह से सियासत से किनारा करना पड़ा था, बिल्कुल उसी तर्ज पर जियाउर्रहमान अंसारी को शाह बानो विवाद पर संसद में आरिफ मोहम्मद खां का विरोध झेलना पड़ा जिन्होंने मुस्लिम महिला कानून के खिलाफ कुरान के हवालों के साथ बड़ी जबर्दस्त तकरीर की थी। जिसके जवाब में जियाउर्रहमान अंसारी ने इस कानून के पक्ष में क़ुरान के हवालों से बड़ी शानदार तक़रीर की थी इस तक़रीर से ही प्रभावित होकर कांग्रेस ने उस कानून को संसद में उसे पास करा दिया था। आरिफ मोहम्मद खां को सियासत में लाने वाले जियाउर्रहमान अंसारी ही हैं। उनके बेटे अनीसुर्ररहमान ने बताया कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनकी आरिफ मोहम्मद खां से दोस्ती हो गई थी और उन्होंने ही उन्हें अपने अब्बा जियाउर्रहमान अंसारी से उन्हें मिलवाया था। अनीसुर्रहमान बताते हैं कि अभी भी उनके ताल्लुकात आरिफ मोहम्मद खां से बाकी हैं।

जिउर्रहमान अंसारी उप राष्ट्रपति जस्टिस हिदायतुल्लाह के साथ 1984 में

जियाउर्रहमान अंसारी उन्नाव लोकसभा सीट से सासंद होने से पहले ही यूपी एसेंबली के लिए 1962 और 1967 में चुनाव जीत चुके थे। उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की और राजनीति में आए। जियाउर्रहमान अंसारी के दादा ने बांगरमऊ में बसने के बाद गंज मुरादाबाद के मशहूर पीर मौलाना फजलुर्रहमान से बैयत अख्तियार कर ली और यह सिलसिला जियाउर्रहमान अंसारी तक चलता रहा। उनकी पूरी सियासी जिंदगी देखी जाए तो महसूस होता है कि मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद जियाउर्रहमान अंसारी ही थे जिनको बतौर मुस्लिम रहनुमा कांग्रेस और सरकार में लोकप्रियता हासिल थी। उन्होंने 1986 में ऑल इंडिया कनेवेंशन ऑफ मुस्लिम कांग्रेस को संबोधित किया और ऑल इंडिया मोमिन कांफ्रेस के अध्यक्ष के पद पर 1973 से 1990 तक बने रहे। उनके नेतृत्व में इस मोमिन कांफ्रेंस का ही योगदान है कि आज हिंदुस्तान में दस्तकारों, पीतल के बर्तनों, लकड़ी पर नक्श निगारी, शीशे के काम, जवहरात और जेवरात की डिज़ाइन , कालीन बुनाई , दरी बुनाई, संगमरमर की नक्शकारी में मुस्लिम कारीगर बहुत बड़ी तादाद में पाए जाते हैं और इनमें से ज़्यादा तर खुशहाल ज़िंदगी बसर कर रहे हैं। जियाउर्रहमान अंसारी ने 1986 में राजघाट के पास दस्तकारों की एक बड़ी रैली को संबोधित किया और उनके ज्यादातर समस्याओं को केंदेर सरकार से हल कराने में कामयाबी हासिल की थी।
जियाउर्रहमान अंसारी की आज नौ मार्च को सौवीं सालगिरह पर उनको याद करते हुए यह बात बार बार ज़हन में आती है कि इतने बड़े मुस्लिम रहनुमा की याद में कभी जलसा नहीं होता। उनको खिराजे अकीदत भी पेश नहीं किया जाता जिसके वह हकदार थे।
————————-

Related Articles

Back to top button