
- सपा-कांग्रेस का गठबंधन : दो चुनाव, दो नतीजे
- उम्मीदवार से ज़्यादा अखिलेश के लिये जीत ज़रूरी
● रेहान अंसारी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों में जुटी समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को लेकर बड़ा बदलाव किया है। पार्टी इस बार सिफारिश या गुटबाजी के बजाय सर्वे और जमीनी फीडबैक के आधार पर टिकट वितरण करने की रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव स्वयं इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं और स्पष्ट संदेश दे चुके हैं कि टिकट उसी को मिलेगा जिसकी क्षेत्र में मजबूत पकड़, साफ छवि और जीतने की क्षमता होगी।
सपा ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संभावित उम्मीदवारों का आकलन शुरू कर दिया है। इसके लिए एक निजी एजेंसी से सर्वे कराया जा रहा है, जबकि स्थानीय संगठन और नेताओं से भी फीडबैक लिया जा रहा है। इस पूरी कवायद की कमान उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एवं रिटायर्ड आईएएस अधिकारी आलोक रंजन के हाथों में बताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, लखनऊ के गोमतीनगर स्थित एक विशेष कार्यालय में विशेषज्ञों की टीम संभावित प्रत्याशियों के सामाजिक समीकरण, जनाधार, लोकप्रियता, छवि और जीत की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन कर चुकी है। रिपोर्ट में उम्मीदवारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया है, जिनमें उनकी चुनाव जीतने की क्षमता, जातीय समीकरणों में फिट बैठना, क्षेत्रीय लोकप्रियता और आपराधिक छवि जैसी बातें प्रमुख हैं।
कांग्रेस को सीमित सीटें देने की सलाह
सर्वे कर रही पूर्व आईएएस की टीम द्वारा तैयार रिपोर्ट में कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन को लेकर भी सुझाव दिए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि 2027 में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता है तो कांग्रेस 100 से अधिक सीटों की मांग कर सकती है, लेकिन सपा को 70 से 75 सीटों तक ही समझौता करना चाहिए।
हालांकि सहारनपुर, अमरोहा और कुछ अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सीटों को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान की संभावना जताई गई है। 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी इन क्षेत्रों पर दावा मजबूत कर सकती है।
2022 और 2024 के अनुभवों से सबक
सपा नेतृत्व का मानना है कि 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर हुए विवादों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया था। 2022 में कई स्थानों पर स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी और पैरवी आधारित टिकट वितरण के आरोप लगे थे। वहीं 2024 लोकसभा चुनाव में मेरठ, मुरादाबाद, बदायूं और गौतमबुद्धनगर जैसी सीटों पर बार-बार उम्मीदवार बदलने से पार्टी को आलोचना का सामना करना पड़ा था।
मुरादाबाद में मौजूदा सांसद एसटी हसन का टिकट काटकर आखिरी वक्त पर रुचिवीरा को दे दिया, जिससे स्थानीय स्तर पर उथल-पुथल मच गई थी। बदायूं में पहले धर्मेंद्र यादव को टिकट दिया गया, फिर उनका टिकट काटकर शिवपाल सिंह यादव को दिया गया और आखिर में शिवपाल के बेटे आदित्य यादव वहां से चुनाव लड़े। टिकटों की इस अदला-बदली के कारण सपा के भीतर की गुटबाजी खुलकर सामने आ गई थी। कांग्रेस और ‘अपना दल (कमेरावादी)’ की पल्लवी पटेल जैसे सहयोगियों के साथ भी सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सार्वजनिक रूप से विवाद सामने आए। सर्वे के बाद सपा को कैंडिडेट चुनना आसान होगा
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस लंबे समय से सर्वे आधारित उम्मीदवार चयन की रणनीति अपनाती रही हैं। अब समाजवादी पार्टी भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है ताकि स्थानीय गुटबाजी और पक्षपातपूर्ण फीडबैक से बचा जा सके।
जीत होगी सबसे बड़ा पैमाना
पार्टी सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव के लिए 2027 में सबसे बड़ा लक्ष्य अधिकतम सीटें जीतना है। ऐसे में किसी बड़े नेता या करीबी चेहरे का टिकट भी कट सकता है यदि सर्वे में उसकी स्थिति कमजोर पाई जाती है। हाल ही में हुई पार्टी की बैठक में अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने के इच्छुक पदाधिकारियों से संगठनात्मक पद छोड़कर अपना दावा पेश करने को भी कहा था।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी इस बार उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को पहले से अधिक वैज्ञानिक और तथ्य आधारित बनाकर 2027 के चुनावी मुकाबले में उतरने की तैयारी कर रही है।



