
कांग्रेसी मंत्री, नैतिकता, तालीम, और ईमानदारी की मिसाल, आबिद अली अंसारी
◆ सुहेल वहीद
सीतापुर का गौरव, मशहूर कांग्रेसी नेता, मोमिन अंसार की महत्वपूर्ण शख़्सियत आबिद अली अंसारी की क़रीब दो दशक तक उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य और कैबिनेट मंत्री रहे और लहरपुर से कई बार विधायक चुने गए।
आज है आबिद अली अंसारी की २६ वीं पुण्य तिथि।
हाजी आबिद अली अंसारी एक बाउसूल, ईमानदार इंसान थे और बुनकरों के साथ ही वह मेहनतकश तबके के लीडर थे। वह एक सीधे सादे इंसान थे जिन्होंने न कभी अपने रूतबे का रोब झाड़ा, न अपनी उच्च शिक्षा का और न ही जनप्रिय होने के घमण्ड का अहसास कराया।
अबिद अली अंसारी की सीतापुर जिले के परसेण्डी ब्लाक के छोटे से गाँव इटारी के एक औसत परिवार में हाजी रसूल अहमद के घर पैदाइश हुई। अपने ननिहाल, लहरपुर में प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद, बिसवां से जूनियर हाईस्कूल किया, कानपुर से इण्टर करने के बाद अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से 1938 में बीएससी तथा 1939 में एलटी किया। यह वह समय था जब अंसारी समाज शिक्षा से कोसों दूर था। उनमें स्नातक तो बिरले ही होते थे। तब आबिद अली अंसारी ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपनी बिरादरी के समक्ष एक मिसाल कायम की और दूसरों को शिक्षा के प्रति प्रेरणा बने।

●तालीम का रुझान
उनकी जिंदगी में तालीम की क्या अहमियत थी, इसका अहसास कराती है एक घटना। उस समय के खैराबाद नगर पालिकाध्यक्ष एहराज मियां ने अंसारी बिरादरी के सामने यह बात रखी कि यदि कोई अंसारी लड़का स्नातक हो तो वह नगर पालिका खैराबाद में प्रशासनिक अधिकारी के पद पर आसीन करा दिया जाएगा। सभी की नजर पड़ी आबिद अली अंसारी पर तो तार दे कर उनको अलीगढ़ से बुलवाया गया। तार का जवाब आया कि मैंने एलटी में दाखिला ले लिया है। प्रशासनिक अधिकारी की कुर्सी से ज्यादा अहम मेरी तालीम है, जिसको बीच में छोड़कर मैं नौकरी करने की बावत सोच भी नही सकता। इस वाक़ये से उनके तालीम के प्रति उनके लगाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद ही उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी के पद को स्वीकार किया।
तालीम इंसानी जिंदगी में कितनी अहमियत रखती है, इसे वही समझते थे। तभी तो उन्होंने 12 अगस्त 1963 को अंसार जूनियर हाई स्कूल की प्रबन्ध समिति में आडिटर की जिम्मेदारी भी संभाली। 1 मई 1967 से 30 जून 1971 तक उनको अंसार जूनियर हाई स्कूल के प्रबन्धक की हैसियत से काम करना पड़ा। इसी दरमियान अन्य कई स्कूलों के प्रबन्धन की जिम्मेदारी भी उनके कंघों पर रही और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।
इसके बाद वह सियासत में आ गए और 1969 में लहरपुर से विधायक चुने गए। मंत्री भी बने लेकिन इटारी में हाजी इलाही बक्श इण्टर कालेज के प्रबन्धक पद पर भी 26 जून 1967 से 30 जून 1970 तक आसीन रहे जो उनके समय में हाई स्कूल तक मान्यता प्राप्त कर पाया था। उनके अथक परिश्रम से इण्टर कालेज तक यह कॉलेज उन्नति कर गया। उस पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा के नए आयाम बनाता हुआ यह स्कूल हजारों बच्चों को शिक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य अभी भी कर रहा है। मुस्लिम लड़कियों के बीच तालीम की शमा जलाने वाले पुराने सीतापुर के एक मात्र मुस्लिम निस्वाँ स्कूल के प्रबन्धन का कार्य भी उन्होंने 15 अप्रैल 1984 से 25 मई 1996 तक संभाला। आबिद अली अंसारी ने अपने सियासी कॉरियर में अपने समाज और बुनकर तबके के पिछड़ेपन को दूर करने तथा आम लोगों की सेवा के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया। वह 1969 से 1980 तक लगातार चार बार लहरपुर से विधायक चुने गए। उनकी लगन ईमानदारी और जनप्रिय छवि से प्रेरित होकर ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें मंत्री बनाया

●चुंगी माफ कराई
वर्ष 1969 में उस समय चन्द्रमानु गुप्त यूपी के मुख्यमंत्री थे। उसी समय कांग्रेस पार्टी में संघटनात्मक विवाद पैदा हो गया, जिससे कांग्रेस सिंडिकेट के यूपी में पंडित कमलापति त्रिपाठी नेता थे तथा इंडीकेट कांग्रेस जिसके चन्द्रभानु गुप्त मुख्यमंत्री नेता थे। सरकार बचाने के लिए चन्द्रभानु गुप्त ने आबिद अली अंसारी से सहयोग माँगा और कहा आप मेरे साथ आ जाएं। आपको मंत्री पद दूँगा। उस समय दरी पर चुंगी व सेलटैक्स था, जिसकी वजह से बुनकर तबके और व्यपारियों को काफी परेशानी होती थी। चंद्रभानु गुप्ता को सहयोग देने की एवज में उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने यह बात रखी कि अगर आप दरी पर चुंगी व सेलटैक्स माफ कर दें तो हम आपका साथ देंगे, मुझे मंत्री पद नही चाहिए। तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त ने चुंगी व सेलटैक्स खत्म करने में अपनी असमर्थता जताई। पंडित कमलापति त्रिपाठी ने सहमति जताई और कहा यदि मै सरकार बनाता हूँ तो मैं आपकी यह शर्त दरी पर चुंगी व सेलटैक्स माफी की बात पूरी कर दूँगा। इस तरह उन्होंने चुंगी हटवाई। पंडित कमलापति त्रिपाठी के नेतृत्व में गठित मंत्री परिषद में भी वह मंत्री बने तथा दरी पर चुंगी और सेल्स टैक्स भी माफ हुआ। कसरैला से लहरपुर मार्ग का पक्का निर्माण करवाया।
रामनरेश यादव मंत्रिमंडल में आबिद अली अंसारी परिवहन मंत्री रहे। परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने सीतापुर सिटी स्टेशन से खैराबाद तक नगरीय बस सेवा चलवाई। बनारसी दास गुप्त के मंत्रिमंडल में वह पर्वतीय विकास मंत्री रहे है।
●नैतिकता की सियासत
आबिद अली अंसारी उसूल और सिद्धान्त की सियासत करते थे। परिवहन मंत्री रहते हुए मुरादाबाद से सीतापुर कार से आते समय कार में लगे रेडियो से समाचार से बरेली से कुछ पहले यह बात पता लगी कि रामनरेश यादव ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया है। आबिद अली अंसारी ने अपने सरकारी ड्राईवर से कहा कि कार बरेली रोडवेज बस स्टैण्ड ले चलो। अब बस से सीतापुर जाऊँगा। ड्राइवर कुछ समझ नहीं पाया और समझा शायद मुझसे कुछ गलती हो गई है तो उन्होंने कहा कि अब इस कार पर चलने का मुझे अधिकार नहीं है। मुख्यमंत्री ने त्यागपत्र दे दिया है।मैं भी अब मंत्री नहीं हूँ और यह कार मुझे मंत्री की हैसियत से मिली है। ड्राईवर ने कहा साहब मैं तो लखनऊ जाऊँगा ही और सीतापुर होकर जाऊँगा। मै खाली गाड़ी लेकर जाऊँगा।बेहतर होगा कि आप मेरे साथ सीतापुर तक कार से चले। लेकिन वह नहीं माने और सीतापुर तक बस से आए।

आबिद अली अंसारी के बेटे इरफान आबिद अपने अब्बा को बड़ी मोहब्बत से याद करते हुए उनकी तारीफ़ करते हुए बताते हैं कि 1977 में रोडवेज में सहायक क्षेत्रीय प्रबन्धक की नियुक्तियों हेतु कम्पटीशन का विज्ञापन निकला। उन्होंने भी कम्पटीशन का फार्म भरा। यह बात जब आबिद अली अंसारी को मालूम हुई तो उन्होने इरफान को मना किया कि वह इस कम्पटीशन में न शामिल हों, लेकिन इरफान नहीं माने और कानपुर में हुए कम्पटीशन में भाग लिया और कम्पटीशन में चुन भी लिए गए। जब लिस्ट आबिद अली अंसारी के सामने वास्ते विभागीय मंत्री होने के नाते मंजूरी के लिए पेश की गई तो इरफान आबिद नाम देखते ही पेश करने वाले अधिकारी पर आग बबुला होते हुए पूछा कि यह नाम इसमें कैसे आया। लिस्ट पेश करने वाले अधिकारी ने कहा कि यह तो कम्पटीशन में उत्तीर्ण होने वाले लोगो की लिस्ट है। इस पर आबिद अली अंसारी ने कहा नहीं यह लिस्ट मंजूर नही की जा सकती और परीक्षा रद्द कर यूपी से बाहर किसी अन्य यूनिवर्सिटी से परीक्षा कराने के आदेश दिए।
पसमांदा लोगो व मोमिन अंसार से जुड़ाव होने के नाते कई वर्षों तक वह यूपी मोमिन कांफ्रेंस के अध्यक्ष रहे। ऑल इण्डिया हैण्डलूम बोर्ड व यूपी हैण्डलूम बोर्ड के कई वर्षों तक मेम्बर रहे। शिवा रमन कमेटी जो भारत सरकार ने हैण्डलूम उघोग के सुधार के लिए वर्ष 1973-74 में बनाई, उसके मेम्बर रहे। अपनी जिन्दगी में हमेशा अपने छोटे बडों को आदर दिया। मंत्री रहते हुए कभी भी यह अहसास नही करते थे कि कैबिनेट मंत्री हैं। कहा करते थे कि आज मंत्री हूँ, कल हो सकता है कि न रहूँ, ऐसी चीज से क्या मोह करना। मंत्री रहते हुए जब भी कभी सीतापुर में अपने घर नाउनटोला से अपने वालिद हाजी रसूल अहमद को देखने कज़ियारे पैदल ही जाते थे, न कोई सुरक्षा, न कोई घोड़ा गाड़ी, यह थी उनकी सादगी। उनका कहना था कि किसी के प्रति अपने मन में कोई दुर्भावना मत रखो।
●हिंदू मुस्लिम एकता
हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी आबिद अली अंसारी का नाम हमेशा अमर रहेगा। उन्होंने अथक प्रयासों से नैमिषारण्य और हरगाँव तीर्थों के सुंदरीकरण का कार्य कराया साथ ही कलियर शरीफ और बहराइच में सैय्यद सालार गाजी की दरगाह के लिए भी विशेष ध्यान देकर वहां पर्यटन के लिए कई कार्य कराए।
हाजी आबिद अली अंसारी चार बार मंत्री रहे लेकिन अपने निजी खजाने को भरने का काम नही किया। इसी का नतीजा है कि उनके कार्यकाल में उन पर न तो किसी प्रकार का भ्रष्टाचार और न ही भाई भतीजावाद और न ही किसी को उपकृत करने का आरोप लगाने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। ऐसे व्यक्ति बिरले ही होते है जो किसी प्रकार के विवादों से अछूते रहे हों।
कौम और देश की ख़िदमत करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की शहीद दिवस के दिन ही 30 जनवरी 1999 को अपने घर नाउनटोला में उन्होंने अन्तिम सॉस ली। अब उनके इस घर पर उनके बेटे इरफान आबिद की नेम प्लेट लगी हुई है और सीतापुर हो या लहरपुर उनकी याद में न कोई जलसा होता है न उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए कोई कार्यक्रम। पंचपथ परिवार की ओर से आबिद अली अंसारी को भावभीनी श्रद्धांजलि।
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