Mamata बनर्जी की राजनीति—1997 से 2026 तक गठबंधन, टकराव और बदलते समीकरण

  • “भाजपा से दोस्ती से लेकर विरोध तक: ममता बनर्जी की राजनीति पर उठते सवाल”

● रेहान अंसारी

“कल जो बोए थे सियासत में रिश्तों के बीज, आज वही पेड़ बनकर सवालों में खड़े हैं।” पश्चिम बंगाल की राजनीति में ये शेर इस वक़्त बिल्कुल फिट बैठता है। क्योंकि जिस तरीके से कांग्रेस को बाहर करने के लिए टीएमसी और भाजपा एक दूसरों के दरों के चक्कर काटते रहे। और टीएमसी भाजपा को हमेशा सॉफ्ट कार्नर देती रही उसी का परिणाम है पश्चिम बंगाल के ताज़ा चुनावी नतीजे।

ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का सफर लगातार बदलते गठबंधनों, रणनीतियों और विवादों से भरा रहा है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है—क्या ममता बनर्जी आज वही परिणाम देख रही हैं, जिसकी नींव उन्होंने खुद रखी थी?

1997: कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी का गठन, साल 1997 में ममता बनर्जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी की स्थापना की। उस समय उनका मुख्य लक्ष्य पश्चिम बंगाल में वाम दलों, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) (CPM) को चुनौती देना था। इस दौरान मुकुल रॉय उनके करीबी सहयोगी बने। बाद में भाजपा में चले गए।

भाजपा के साथ शुरुआती नजदीकियां 1999 में ममता बनर्जी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल हुईं और रेल मंत्री बनीं। सन 2000 में ममता बनर्जी ने  रेलवे बजट पेश कर कई नई ट्रेनों और परियोजनाओं की शुरुआत की, जिससे बंगाल में उनकी पकड़ मजबूत हुई।

2001 में रक्षा घोटाले (ऑपरेशन वेस्ट एंड) रक्षा सौदों में बड़ा घोटाला उजागर होने के बाद उन्होंने गठबंधन छोड़ दिया। इसी दौरान अगस्त 2001 में बीबीसी के एक इंटरव्यू में जब ममता से पूछा गया कि क्या उन की पार्टी के एनडीए में लौटने की कोई संभावना है तो उन्होंने जवाब दिया हां, टीएमसी के घोषणापत्र के मुताबिक भाजपा हमारी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ है। और इसी के बाद 2003 में ममता बनर्जी एनडीए सरकार में लौट आईं, लेकिन कई महीनों तक बिना विभाग के मंत्री रहीं।

2003 में ही ममता ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के उस समय के संपादक तरुण विजय की कम्युनिस्ट आतंकवाद पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन समारोह में शिरकत की। तरुण विजय ने ‘बंगाल की दुर्गा’ कह कर उन का मंच पर स्वागत किया। जिसे सुन कर ममता गदगद हो गईं। और आरएसएस के प्रति वह सॉफ्ट होते गईं। उस दौर में उन्होंने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेताओं के प्रति सकारात्मक रुख भी दिखाया। 

दो बार भाजपा के राज्यसभा सांसद रहे बलबीर पुंज ने सदन में अपनी बात रखते हुए ममता बनर्जी के लिए कहा हमारी प्यारी ममता दी साक्षत दुर्गा हैं। बलबीर पुंज का 18 अप्रैल 2026 को निधन हो चुका है। पुंज भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं।

आरएसएस के लोग सच्चे देश भक्त :ममता। आरएसएस ने भी ममता बनर्जी को ‘बंगाल की दुर्गा’ बताया और वामपंथियों के ख़िलाफ़ उन की लड़ाई के पक्ष में ‘ठोस समर्थन’ जताया। ममता ने भी अपने एक भाषण में आरएसएस के मोहन भागवत, शेषाद्रि चारी और मदन दास देवी का ज़िक्र करते हुए कहा कि ‘मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बहुत ज़्यादा नेताओं को तो नहीं जानती हूं, मगर उन में से कुछ से व्यक्तिगत तौर पर मिली हूं। आप लोग सच्चे देशभक्त हैं। मुझे मालूम है कि आप अपने देश से सच्चा प्यार करते हैं।’

यू-टर्न: भाजपा से दूरी और विपक्षी राजनीति 2004 लोकसभा चुनाव में टीएमसी का प्रदर्शन कमजोर रहा और ममता अकेली सांसद बचीं।  2006 विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ, जिससे उनका राजनीतिक आधार कमजोर हुआ। इसी दौर में टीएमसी ने धीरे-धीरे भाजपा से दूरी बनानी शुरू की। 2011 में पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत के बाद ममता बनर्जी ने वाम दलों का 34 साल पुराना शासन खत्म किया। इसके बाद उनका रुख धीरे-धीरे भाजपा के खिलाफ सख्त होता गया।

2012 में आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता बनर्जी की सादगीपूर्ण जीवनशैली की तारीफ़ करते हुए लेख लिखा। उसमें कहा गया कि ‘ममता उन बिरले राजनीतिकों में हैं, जिन्होंने राजनीति का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया। काश कि देश को ऐसे ज़्यादा-से-ज़्यादा राजनीतिक मिलें।’ 2014 के बाद बंगाल में भाजपा का विस्तार तेजी से हुआ, जिससे टीएमसी के लिए चुनौती बढ़ी। 

2019 के बाद उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ बड़े आंदोलन किए। लेकिन जब CAA पर संसद में मतदान हुआ तो TMC के 8 सांसद सदन से गायब रहे और इस वजह से विधेयक पारित हो गया। विधेयक पारित होने के बाद ममता बनर्जी ने इन पर कोई कार्यवाई नहीं कि और इन्हें बख्श दिया। संसद में CAA वोटिंग के दौरान टीएमसी सांसदों की अनुपस्थिति पर विपक्ष ने भी सवाल भी उठाए। लेकिन सब ठंडे बस्ते में चला गया।

जनवरी 2020 को जब भाजपा सरकार के तत्कालीन वित राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने अपने भाषण में ‘गोली मारो सालों को’ के नारे लगवाए तो टीएमसी के नेता शेख आलम ने सीएए का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर मुर्शिदाबाद में गोलियां चला दीं।

मुकुल रॉय की वापसी और ‘बीजेपी=टीएमसी’ बयान
2017 में भाजपा में शामिल हो चुके मुकुल रॉय 2021 विधानसभा चुनाव से पहले फिर टीएमसी में लौट आए। ममता ने भी इनको खुशी खुशी शामिल कर लिया। चुनाव के दौरान मुकुल ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा “बीजेपी इज इक्वल टू टीएमसी” इस बयान से राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा बनी रही।

2022: उपराष्ट्रपति चुनाव और अलग रुख
2022 के उपराष्ट्रपति चुनाव में टीएमसी ने विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का समर्थन नहीं किया। मतदान से दूरी बनाई और वोटिंग में गैरहाज़िर रहे। इसका सीधा फायदा जगदीप धनखड़ को मिला, जो चुनाव जीत गए। ऐसे ममता ने उन धनकड़ की मदद की जिन्होंने बंगाल में राज्यपाल रहते हुए ममता बनर्जी का जीना मुश्किल कर दिया था।

आरएसएस पर नरम रुख और नई बहस
ये बात है 2022 के वर्ष की ममता बनर्जी ने कई मौकों पर आरएसएस की दिल खोल कर तारीफ की। और कहा कि आरएसएस में बहुत से बड़े अच्छे लोग हैं। इससे उनके राजनीतिक रुख को लेकर नई बहस शुरू हो गई।

INDIA गठबंधन और बढ़ती दूरी
2023-24 में बने विपक्षी गठबंधन INDIA गठबंधन में टीएमसी की भूमिका अहम मानी जा रही थी, लेकिन सीट बंटवारे और रणनीतिक मतभेदों के कारण कई बार दूरी भी सामने आई।

राजनीतिक विश्लेषण: क्या बदले समीकरण का असर? और इस तरह BJD , BSP , SS , JDU, TRS , YSR , PDP के बाद TMC को वही अजगर खा गया….. ममता बनर्जी जो बोईं वहीं काट रहीं हैं, इंडिया गठबंधन तोड़ कर उन्होंने जो बोया वही काट रहीं हैं। अब उनकी पार्टी के सांसदों का राघव चड्ढा होना तय है ?

ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा “लचीले गठबंधन” पर आधारित रही है भाजपा के साथ शुरुआती नजदीकियां और बाद में तीखा विरोध—दोनों ने उनकी छवि को जटिल बनाया विपक्षी एकता में उनकी स्वतंत्र लाइन कई बार टकराव का कारण बनी।

ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति में रणनीति, अवसर और बदलाव का अनोखा उदाहरण है। आज के हालात के हिसाब से तो यही लगता है कि “जो बोया वही काटा” हैं, तो वहीं एक ओर ये भी लगता है कि एक मजबूत क्षेत्रीय नेता की स्वतंत्र राजनीतिक शैली हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है—जहां गठबंधन राजनीति में हर कदम भविष्य की दिशा तय करता है।

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