
- महिला, ब्राह्मण, और मुस्लिम समीकरण पर कांग्रेस का दांव, यूपी में बदली रणनीति
● रेहान अंसारी
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने संगठन में बड़ा फेरबदल किया है। पार्टी ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान अजय राय से लेकर विधायक आराधना मिश्रा उर्फ मोना को सौंप दी है। वहीं सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद को उत्तर प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
कांग्रेस के इस फैसले को महज संगठनात्मक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। चुनाव से पहले पार्टी ने उत्तर प्रदेश में जातीय, क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है। एक तरफ आराधना मिश्रा के जरिए महिला और ब्राह्मण मतदाताओं तक पहुंच बनाने का प्रयास दिखाई देता है, तो दूसरी तरफ इमरान मसूद को जिम्मेदारी देकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मुस्लिम मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने की कोशिश मानी जा रही है।
कौन हैं आराधना मिश्रा मोना?
नवनियुक्त प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा उर्फ मोना रामपुर खास विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस की विधायक हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं।
आराधना मिश्रा का राजनीतिक सफर कांग्रेस से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनका परिवार कई पीढ़ियों से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहा है। यही वजह है कि संगठन और पार्टी की विचारधारा से उनका जुड़ाव लंबे समय से रहा है।
ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं, कांग्रेस ने प्रदेश संगठन की कमान आराधना मिश्रा को देकर पार्टी के पुराने और प्रभावशाली राजनीतिक परिवार पर भरोसा जताया है।
कांग्रेस ने आराधना मिश्रा को ही क्यों चुना?
राजनीतिक नजरिए से देखें तो आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे कांग्रेस के सामने कई लक्ष्य हो सकते हैं।
सबसे पहला लक्ष्य महिला मतदाताओं को साधना माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। जिसे आधी आबादी भी कहा जा रहा है। यानी पचास प्रतिशत वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।
दूसरा बड़ा समीकरण ब्राह्मण वोट बैंक का है।
आराधना मिश्रा ब्राह्मण परिवार से आती हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। कांग्रेस का एक समय इस वर्ग में मजबूत आधार रहा है, लेकिन पिछले कई चुनावों में पार्टी इस वोट बैंक से काफी हद तक दूर हुई है।
ऐसे में आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ब्राह्मण समाज के बीच अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की कोशिश कर सकती है।
यानी कांग्रेस के सामने एक तरफ महिला मतदाता हैं और दूसरी तरफ ब्राह्मण मतदाता। पार्टी ने दोनों समीकरणों को एक साथ साधने का प्रयास किया है। इस बार ब्राह्मण मतदाता भाजपा से खासा नाराज़ भी चल रहा है।
महिला + ब्राह्मण का नया राजनीतिक फॉर्मूला?
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से जटिल राज्य में किसी पार्टी के लिए केवल एक सामाजिक वर्ग के भरोसे चुनावी जमीन तैयार करना आसान नहीं है। कांग्रेस भी शायद इसी बात को समझते हुए अलग-अलग सामाजिक समूहों को जोड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पार्टी के पास महिला नेतृत्व भी है और मजबूत सामाजिक आधार वाले नेताओं को आगे बढ़ाने की क्षमता भी। हालांकि यह रणनीति वोट में कितना बदलती है, यह आने वाले चुनाव में ही स्पष्ट होगा।
सपा पर भी दबाव बनाने की कोशिश?
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की राजनीति उत्तर प्रदेश में पहले से चर्चा का विषय रही है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर आराधना मिश्रा की नियुक्ति को गठबंधन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
कांग्रेस शायद यह संकेत देना चाहती है कि वह उत्तर प्रदेश में केवल गठबंधन सहयोगी की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करके चुनावी मैदान में अपनी स्थिति मजबूत रखना चाहती है।
राजनीतिक संदेश साफ है अगर गठबंधन में कांग्रेस को पर्याप्त राजनीतिक सम्मान और हिस्सेदारी नहीं मिलती है, तो पार्टी के पास अपने दम पर अलग रणनीति तैयार करने की क्षमता भी है। यही वजह है कि आराधना मिश्रा की नियुक्ति को कांग्रेस और सपा के बीच सीटों तथा राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर होने वाली भविष्य की बातचीत के नज़रिये से भी देखा जा रहा है।
अब इमरान मसूद की बारी
कांग्रेस ने केवल प्रदेश अध्यक्ष बदलकर ही अपना सामाजिक समीकरण नहीं साधा, बल्कि सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को भी साधने की कोशिश की है। इमरान मसूद अपने बेबाक अंदाज और मुखर राजनीतिक बयानों के लिए जाने जाते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव माना जाता है।
उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने को कांग्रेस की मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
कांग्रेस की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का एक समय मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत आधार माना जाता था। लेकिन समय के साथ यह वोट बैंक अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर गया। अब कांग्रेस एक बार फिर मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
इमरान मसूद को प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सहारनपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक पहचान कांग्रेस के लिए इस लिहाज से उपयोगी हो सकती है।
एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष के रूप में आराधना मिश्रा और दूसरी तरफ कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में इमरान मसूद—कांग्रेस ने एक ही समय में दो अलग-अलग सामाजिक समीकरणों को साधने का प्रयास किया है।
प्रियंका गांधी की भूमिका पर भी चर्चा
इमरान मसूद को कांग्रेस नेतृत्व के करीबी नेताओं में माना जाता रहा है और उनकी प्रियंका गांधी के करीबी लोगों में भी राजनीतिक गलियारों में होती रही है।
यानी कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति में दो अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को एक साथ साधने का प्रयास किया है।
क्या कांग्रेस का यह प्रयोग सफल होगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस की यह रणनीति जमीन पर कितनी सफल होगी? कागज पर कांग्रेस ने महिला, ब्राह्मण और मुस्लिम—तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल जातीय और धार्मिक समीकरणों से तय नहीं होती। संगठन की ताकत, बूथ स्तर की मौजूदगी, उम्मीदवारों का चयन, गठबंधन की स्थिति और स्थानीय मुद्दे भी चुनावी परिणाम पर बड़ा प्रभाव डालते हैं।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इन राजनीतिक समीकरणों को वास्तविक वोट में कैसे बदलती है। साथ ही यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का तालमेल किस रूप में आगे बढ़ता है और दोनों दल सीट बंटवारे तथा चुनावी रणनीति को लेकर किस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। फिलहाल कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपने नए नेतृत्व के जरिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश जरूर दे दिया है। फिलहाल इतना जरूर है कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपनी चाल चल दी है। अब नजर इस बात पर है कि इस चाल का राजनीतिक असर कितना बड़ा होता है।



