समाजवाद के पुरोधा को अपनों ने ही भुलाया, आचार्य नरेंद्र देव को भूले सीतापुर के ज़िम्मेदार…..

  • रेहान अंसारी

शहर की मुख्य बाज़ार के मुख्य मार्ग गुरुद्वारा तिराहे पर लगी यह मूर्ति किसकी है ? कुछ को छोड़ ज़्यादातर लोग नहीं जानते होंगे..! जो लोग नहीं जानते हैं उनको हम बताना चाहते हैं यह प्रतिमा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजवादी विचारक, महान दार्शनिक आचार्य नरेंद्र देव जी की है। जिन्हें यह शहर शायद भूल सा गया है। आम लोगों की क्या ही बात करें जब ज़िम्मेदारों तक को याद नहीं रही उनकी जयंती।आचार्य नरेंद्र देव जी का जन्म 31 अक्टूबर 1889 को गुरुद्वारा रोड स्थित मुरली निवास में हुआ था था आचार्य जी युवास्था से ही देश की आज़ादी के लिए आंदोलनों में जम खड़े हुए थे और कलकत्ता से शुरुआत की थी और वह भारतीय राजनीति में समाजवाद के प्रबल समर्थक भी थे। कम से कम तब तो सीतापुर के अपने आपको समाजवादी नेता कहने वाले नेताओं को शर्म आनी चाहिए समाजवादी नेता तो उनकी प्रतिमा तक जा ही सकते थे, खैर….

आचार्य जी की कर्मस्थली ज़्यादातर अयोध्या की तरफ रही लेकिन उनकी जन्मस्थली सीतापुर है। सीतापुर के वासियों को याद रखना चाहिए। यह बड़ी विडंबना है कि ऐसे महापुरुषों की स्मृतियों को सहेजने में सीतापुर के ज़िम्मेदार, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अफसरों को कोई दिलचस्पी नहीं है। जिस मुरली निवास में आचार्य जी का जन्म हुआ वह भी खंडहर की ही कगार पर खड़ी है। उसी से कुछ दूर पर स्थित उनकी प्रतिमा धूल फांक रही है। नगर पालिका के ज़िम्मेदार वहाँ पर साफ सफाई कराने में असमर्थ ऐसे नज़र आते हैं। और प्रतिमा अतिक्रमण की जंजीरों में भी जकड़ी हुई नज़र आती है। प्रतिमा के आस पास की सड़क की बात करें तो सड़क कम गड्ढे ज़्यादा नज़र आएंगे। नगर पालिका से इतना नहीं हुआ कि उनकी जयंती के मौके पर ही झाड़ू और चूना ही करवा देते।

आचार्य नरेंद्र देव की प्रतिमा के पास फैली गंदगी

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना और समाजवाद
आचार्य नरेंद्र देव जी को भारत में समाजवाद और भारत में समाजवादी आंदोलन के जनक के रूप में भी देखा जाता है। पार्टी की स्थापना 1934 में उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई और इसके अध्यक्ष बने। किसान आंदोलन में अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे और उन्होंने मजदूरों, किसानों तथा गरीबों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। वे मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन से गहरे प्रभावित थे, लेकिन उनका मानना था कि समाजवाद केवल आर्थिक या भौतिकवाद तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह नैतिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। उनका प्रसिद्ध कथन था— “सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र एक धोखा है।” पार्टी का सफर उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी और बाद में इसके उत्तराधिकारी संगठन प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) से अपने जीवन के अंत (1956) तक जुड़े रहे।आचार्य नरेंद्र देव जी विधायी और शैक्षणिक सफर भी बहुत मज़बूत रहा। आचार्य जी उत्तर प्रदेश में विधानसभा के सदस्य भी रहे और एक वो समय था जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होने के बाद सदन की सदस्यता भी छोड़ दी थी। जबकि नेहरू जी ऐसा नहीं चाहते थे। बाद में हुए चुनावों में नेहरू जी उनके विरुद्ध प्रत्याशी नहीं उतारना चाहते थे। लेकिन पार्टी के कहने पर बाबा राघवदस उनके खिलाफ चुनाव लड़े और आचार्य नरेंद्र देव की चुनाव हार गए। जिसको लेकर नेहरू जी दुखी भी हुए।
बाद में आचार्य नरेंद्र जी को लखनऊ विश्वविद्यालय के आठवें कुलपति के रूप में नियुक्त हुए और उसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के कुलपति भी रहे।

आचार्य नरेंद्र देव की प्रतिमा पर मार्ल्यापण करने पहुंचे संस्था के लोग

आचार्य नरेंद्र देव जन्म भूमि स्थल संरक्षण समिति सीतापुर के संयोजक और सदस्यगण गुरुद्वारा रोड स्थित आचार्य जी की प्रतिमा पर मार्ल्यापण करने पहुंचे और उसके बाद नगर पालिका के बाहर स्थित प्रतिमा पर भी किया मार्ल्यापण भी किया इस दौरान दिनेश अम्बेडकर गांधी, अजय, रोशन लाल, राम लखन आदि लोग मौजूद रहे।

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