बज़्मे उर्दू की तरफ से Lucknow के मशहूर शायरों के सम्मान में शानदार महफ़िल का आयोजन

तारीख़ की किताब से मुझको निचोड़ कर,
गूँधा गया है शहर की मिट्टी में आज फिर

सीतापुर (पंच पथ न्यूज़)। पुरानी और प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था बज़्मे-ए-उर्दू की देखरेख में लखनऊ से आए मशहूर शायरों के सम्मान में एक खास काव्य गोष्ठी (मुशायरा) आयोजित किया गई। इस कार्यक्रम में लखनऊ के नामी शायर और लेखक रिज़वान अहमद फ़ारूकी, हैदर अलवी, डॉ. मंसूर हसन खान और अहमद जमाल कौसर ने मुख्य अतिथि के रूप में हिस्सा लिया।

इस महफ़िल की अध्यक्षता मशहूर शायर मस्त हफीज़ रहमानी ने की। अपने भाषण में उन्होंने उर्दू भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए श्बज़्म-ए-उर्दूश् की 55 सालों की सेवाओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह संस्था सीतापुर जिले और खास तौर पर अवध क्षेत्र के लिए एक मजबूत स्तंभ की तरह है। इस मौके पर रिज़वान अहमद फ़ारूकी ने कहा कि सीतापुर की धरती हमेशा से ज्ञान और साहित्य का केंद्र रही है। उन्होंने बज़्म-ए-उर्दू की मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि संस्था ने यहाँ की साहित्यिक परंपराओं को बहुत अच्छे से संजोया है। कार्यक्रम का संचालन (एंकरिंग) संस्था के सचिव खुश्तर रहमानी ने बहुत ही खूबी के साथ किया।

इस महफ़िल में शायरों ने अपनी बेहतरीन रचनाओं से सुनने वालों का दिल जीत लिया। पढे गए आश्अआर इस तरह हैं —

सब के हाथों में नया इक साज़ है
मेरा चुप रहना भी इक आवाज़ है
मस्त हफ़ीज़ रहमानी

मैं तो सुकून पा गया इक दर तलाश कर
अब तू ग़म-ए-हयात नया घर तलाश कर
रिज़वान अहमद फ़ारूक़ी

किसी भी शेर पर मेरे जब उनकी दाद मिलती है
मुझे चारों तरफ से फिर मुबारकबाद मिलती है
अहमद जमाल कौसर

कुछ जो सूरज से इख्तिलाफ़ रहा
यह ज़माना मेरे खिलाफ रहा
हैदर अलवी

चला हूँ साथ जब से हौसलों के
मैं घबराता नहीं अब ज़िंदगी में
डॉक्टर मंसूर हसन खान

इतिहास की किताब से मुझको निचोड़ कर
गूंदा गया है शहर की मिट्टी में आज फिर
खुश्तर रहमानी

दूर तक निगाहों में धूप है मसाइल की
तप रहे हैं गर्मी से सायबान वाले भी
हाफिज़ मसूद महमूदाबादी

बागबान-ए-गुलिस्ताँ का देख कर तर्ज़-ए-अमल
ऐसा लगता है चमन की आबरू खतरे में है
– मौलाना अतहर कमलापुरी

तेरे जलवे, तेरा हुस्न-ए-सरापा कौन देखेगा
यह दुनिया खुद तमाशा है तमाशा कौन देखेगा
– क़ारी मोहम्मद आज़म जहांगीराबादी

कहता रहा वह मेरा हमारा नहीं कहा
उसके ख्याल में तो कभी थे ही हम नहीं
– आज़म कुरैशी

इस नशिस्त में खुश्तर रहमानी, आज़म जहांगीराबादी, मौलाना अतहर कमलापुरी, हाफिज़ मसूद महमूदाबादी, रियाज़ुद्दीन रियाज़ और कैफ़ी चिश्ती ने भी अपना कलाम पेश किया। प्रोग्राम की कामयाबी में अबुज़र नोमान और अंज़र हस्सान खान का खास योगदान रहा।

Related Articles

Back to top button