
● रेहान अंसारी
जी हाँ सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को ज़्यादातर सभी भैया जी कह कर ही बुलाते हैं फिर चाहे वो पत्रकार हों या अन्य माननीय हो कार्यकर्ता हो। भैया जी की प्रेस कांफ्रेंस रोज़ सही समय पर लखनऊ में पार्टी कार्यालय पर शुरू हो जाती है। पत्रकारों से हसी मज़ाक होता है। एक आध की टाँग खिंची जाती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधा जाता है। चुटकुले बाज़ी होती है। और शाम आते आते भैया जी धन्ना सेठों के वहाँ शादी बियाहों में नज़र आते हैं। अब आतें है चुनावी बातों पर।
“उत्तर प्रदेश में 6 महीने बाद ही चुनावी सरगर्मी शुरू हो जाएगी। अखिलेश यादव अपने कार्यालय में 5 Star एयरकंडीशन प्रेस थिएटर बनाया है।
पिछले एक साल से लगभग रोज़ ही देख रहा हूं, अखिलेश यादव दोपहर 1-1.5 बजे नियमित रूप से पत्रकारों के साथ गपबाजी करते हैं, पत्रकारों का मज़ाक़ उड़ाते हैं, मुख्यमंत्री पर चुटकुलेबाजी करते हैं और कुछ छोटे-मोटे लोगों को पार्टी ज्वाइन कराकर चले जाते हैं कभी कभार बड़े भी और रात में किसी धन्नासेठ के यहां शादी में फोटो खिंचाते फिरते हैं।
चुनावी साल में अखिलेश यादव यह हाल है, फिर कहेंगे चुनाव आयोग ने चुनाव चोरी कर लिया। अरे वह तो सब सब तिगड़म भिड़ा रहें हैं, लेकिन सवाल ये उठता है कि आप क्या कर रहे हैं….?
आप से धूप बर्दाश्त नहीं, एसी कमरों गाड़ियों से बाहर निकलना नहीं चाहते। ग़ाज़ीपुर से लेकर फतेहपुर तक दलित और ओबीसी नाबालिग लड़कियों की बलात्कार और हत्या हुई, आप हिल नहीं सके पैसे भिजवा दिये। नोएडा से आपने मार्च अंत मे चुनावी हुंकार भरी उसी नोएडा में मज़दूरों वर्करों ने इतना बड़ा प्रोटेस्ट किया इतना बवाल हुआ आप खुद जा नहीं सके आपने प्रतिनिधि मंडल भेजा वो भी सफल नहीं हुआ।
आपके पैसे देखता कौन है ? ऐसे मामलों में पार्टी अध्यक्ष के जाने से पार्टी और कार्यकर्ता मोबलाइज़ होते हैं उनमें जोश बढ़ता है। मगर दावत खाने और शेरो शायरी से फुर्सत ही नहीं। आज़म खान सीतापुर जेल में साल भर से ज़्यादा बंद रहे अखिलेश यादव 100 किलोमीटर का सफर तय कर के उनसे मिलने नहीं आ सके, आखिर क्या मजबूरी रही ? फिर अखिलेश यादव ट्वीट करते हैं कि हम वो नहीं जो मुश्किल वक़्त में साथ छोड़ दें। अखिर ये वाक्य कह कर अखिलेश यादव किस पर निशाना साध रहे थे ? सपा के कद्दावर नेता आज़म खान से ज़्यादा किसी का मुश्किल वक़्त रहा होगा यूपी में BJP सरकार आने के बाद ? आखिर तब अखिलेश यादव क्या कर रहे थें उन्होंने आज़म परिवार के लिए क्या मदद की ? आज़म के मुश्किल वक़्त में अखिलेश यादव की दूरी क्या राजनीति मजबूरी थी या कुछ और ही मसला था ?
ज़मीनी हकीकत यह है कि 2024 से PDA – PDA कर रहे हैं मगर दो साल में किसी को समझा ही नहीं पाए कि ये PDA क्या है? लगता तो यह है कि खुद इनको ही नहीं पता कि PDA आखिर क्या है?
जितनी बार पूछिए अलग-अलग डिकोड करते हैं…… इसको लेकर सत्ता पक्ष भी कई बार मज़ाक बना चुका है। सपा के कार्यकर्ता कहीं ज़मीन पर दिखाई नही देते और जो दिखाई भी देते हैं। वो ज़मीन पर रहते हुए भी हवा में रहते हैं।
और सपा के कार्यकर्ता ऐसे पिछले SIR से घर घर पहुंच रही मशीनरी का मुकाबला करेंगे…….?



